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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

भगवन्ह्यस्तनेन त्वं वाक्यसंदर्भजन्मना । कच्चिन्मुक्तोऽसि खेदेन तपःकार्श्यातिशायिना ॥ २ ॥ ह्यस्तनोक्तो य आनन्दी विविक्तो वचसां गणः । अमृतावर्षणेनेव तेनैवाश्वासिता वयम् ॥ ३ ॥ चन्द्रांशव इवोत्सार्य तमांस्यमृतनिर्मलाः । अन्तःशीतलयन्त्येता महताममला गिरः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, कल की उपदेश कथावली से उत्पन्न हुए तथा तपस्या के क्लेश से भी बढ़े-चढ़े श्रम से आप मुक्त हो गये हैं श्रोताओं को आनन्द देनेवाला जो विशद वचन समूह आपने कल कहा था, अमृत की वर्षा के तुल्य उसी वचन समूह से हम लोग आश्वासित हुए हैँ । जैसे अमृत से निर्मल चन्द्रमा की किरणें अन्धकार को हटाकर अन्तःकरण को शीतल करती हैं वैसे ही अमृत की तरह निर्मल ये महात्माओं के विशद उपदेश अज्ञानान्धकार को हटाकर अन्तःकरण को सन्तापरहित कर देते हैँ