Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 15–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
राघव स्वकुलैकेन्दो यन्मयोक्तं महामते ।
कच्चित्स्मरसि वाक्यार्थं पूर्वापरविचारितम् ॥ १५ ॥
उत्पत्तीनां विचित्राणां सत्त्वादिगुणभेदतः ।
कच्चित्स्मरसि सर्वासां विभागमरिमर्दन ॥ १६ ॥
कश्चित्सर्वमसर्वं च सदसच्च सदोदितम् ।
रूपं स्मरसि वेत्स्येव विविक्तं परमात्मनः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, हे अपने रघुकुल के एकमात्र प्रकाशक चन्द्र, हे महामते,
जो मैंने पूर्वापर विचारित वाक्यार्थ कहा था, क्या उसका आपको स्मरण हैं ? क्या आप मन के समान
माया से जगत के वेश में स्थित ब्रह्मरूप, निष्प्रपंच ब्रह्मरूप, स्थूल, सूक्ष्म, सदा उदित परमात्मा के रूप
का, जो हमने कहा था, स्मरण करते हो ? अथवा अपनी बुद्धि से दृश्य से अतिरिक्त उसे जानते
हो ?