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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 32

इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग प्रह्नमाद का विष्णु की मानसपूजा और असुरों के साथ बाह्य पूजा करना और उसे सुनकर आश्चर्य में पड़े हुए देवताओं का भगवान विष्णु से पूछना |

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  1. Verses 1–5श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, प्रह्लाद ने यह विचार कर और भावना द्वारा अपने शर…
  2. Verse 6इन पूजनीय देवाधिदेव की बाहरी उपकरणों से विस्तृत तथा बहुत रत्नों से पूर्ण पूजा से फिर बाह्…
  3. Verses 7–16प्रह्ाद ने एेसा विचारकर विविध पूजा-सामग्रियों से पूर्ण मन से लक्ष्मी के पति भगवान विष्णु…
  4. Verses 17–19तदुपरान्त दानवराज प्रह्लाद ने उस देवगृह में बाह्य समामग्री से पूर्णं पूजा से भगवान विष्णु…
  5. Verses 20–24बड़ा आश्चर्य हुआ कि दैत्यों ने किस हेतु विष्णु भगवान की भक्ति अपनाई है ? आश्चर्य में डूबे…
  6. Verses 25–28भगवन्‌ यह क्या बात है, जो दैत्य सदा ही आपके विरुद्ध रहनेवाले आपके भक्त हो गये हैं। मालूम…
  7. Verses 29–32यदि कहिये कश्यप ऋषि के वंशधर होने के कारण वे भी तुम्हारे सदश ही हैं, तो गुणों में वैषम्य…
  8. Verse 33कमलिनी सन्तप्त ऊषर भूमि में स्थित है, यह कथा जैसे श्रोताओं को सुख नहीं देती वैसे ही हे भग…