Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, Verses 1–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 1-5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्रह्राद इति संचिन्त्य कृत्वा नारायणीं तनुम् ।
पुनः संचिन्तयामास पूजार्थमसुरद्विषः ॥ १ ॥
वपुषो वैष्णवादस्मान्मा भून्मूर्तिः परावरा ।
अयं प्राणप्रवाहेण बहिर्विष्णुः स्थितोऽपरः ॥ २ ॥
वैनतेयसमारूढः स्फुरच्छक्तिचतुष्टयः ।
शङ्खचक्रगदापाणिः श्यामलाङ्गश्चतुर्भुजः ॥ ३ ॥
चन्द्रार्कनयनः श्रीमान्कान्तनन्दकनन्दनः ।
पद्मपाणिर्विशालाक्षः शार्ङ्गधन्वा महाद्युतिः ॥ ४ ॥
तदेनं पूजयाम्याशु परिवारसमन्वितम् ।
सपर्यया मनोमय्या सर्वसंभाररम्यया ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, प्रह्लाद ने यह विचार कर और भावना द्वारा अपने शरीर
को नारायणरूप बनाकर भगवान विष्णु की पूजा के लिए फिर विचार किया । मुझसे कल्पित इस वैष्णव
शरीर से अन्य समष्टिरूप अथवा व्यष्टि देवतारूप मूर्ति न हो, किन्तु यह मद्रूप विष्णु ही, जो गरुड पर
बैठे हुए क्रिया, ज्ञान, इच्छा, अनुग्रहरूप चार शक्तियों से सम्पन्न, हाथ में शंख, चक्र और गदा लिये
हुए, श्यामल शरीर, चतुर्बाहु, चन्द्र-सूर्य रूपी नेत्रवाले, सुन्दर नन्दननामक खड्ग से अपने भक्तों को
प्रसन्न किये हुए महाकान्तिवाले ओर संकर्षण, प्रद्युम्न आदि व्याह और पार्षदों से युक्त हैं, हृदय से
पुष्पांजलि भावना द्वारा बाहर आवाहित होकर पूजा की समाप्ति तक अन्य की तरह स्थित हों । इनकी
मैं सब सामग्रियों से रमणीय मानसिक पूजा करता हूँ
सर्ग सन्दर्भ
इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग प्रह्नमाद का विष्णु की मानसपूजा और असुरों के साथ बाह्य पूजा करना और उसे सुनकर आश्चर्य में पड़े हुए देवताओं का भगवान विष्णु से पूछना |