Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, Verses 7–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, verses 7–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 7-16
संस्कृत श्लोक
प्रह्राद इति संचिन्त्य संभारभरभारिणा ।
मनसा पूजयामास माधवं कमलाधवम् ॥ ७ ॥
रत्नौघपात्रपटलैश्चन्दनादिविलेपनैः ।
धूपैर्दीपैर्विचित्रैश्च नानाविभवभूषणैः ॥ ८ ॥
मन्दारमालावलनैर्हेमाब्जपटलोत्करैः ।
कल्पवृक्षलतागुच्छै रत्नस्तबकमण्डलैः ॥ ९ ॥
पल्लवैर्दिव्यवृक्षाणां नानाकुसुमदामभिः ।
किंकिरातैर्बकैः कुन्दैश्चम्पकैरसितोत्पलैः ॥ १० ॥
कह्लारैः कुमुदैः काशैः खर्जूरैश्चूतकिंशुकैः ।
अशोकैर्मदनैर्बिल्वैः कर्णिकारैः किरातकैः ॥ ११ ॥
कदम्बैर्बकुलैर्निम्बैः सिन्दुवारैः सयूथकैः ।
पारिभद्रैगुग्गुलीभिर्बिन्दुकैः पुष्पकोत्करैः ॥ १२ ॥
प्रियङ्गुपटलैः पाटैः पाटलैर्धातुपाटलैः ।
आम्रैराम्रातकैर्गव्यैर्हरीतकबिभीतकैः ॥ १३ ॥
शालतालतमालानां लताकुसुमपल्लवैः ।
कोमलैः कलिकाजालैः सहकारैः सकुङ्कुमैः ॥ १४ ॥
केतकैः शतपत्रैश्च तथैलामञ्जरीगणैः ।
सर्वसौन्दर्यसंमानैः स्वयमात्मार्पणैरपि ॥ १५ ॥
हरिं परमया भक्त्या जगद्विभवभव्यया ।
मनसा पूजयामास प्रह्रादोऽन्तःपुरे पतिम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रह्ाद ने एेसा विचारकर विविध
पूजा-सामग्रियों से पूर्ण मन से लक्ष्मी के पति भगवान विष्णु की पूजा की । रत्नों के समूहों से जटित
विविध पात्रं के प्रान्त द्वारा किये गये अभिषेकं से, चन्दन आदि के विलेपनं से, धूप, दीप ओर विविध
प्रकार के विभववाले आभूषणों से, मन्दार की मालाओं के वेष्टनों से, सुवर्ण-कमलों की राशियों से,
कल्पवृक्ष की लताओं के गुच्छो से, रत्नों के गुच्छं से ओर कल्प वृक्ष आदि देव वृक्षों के पल्लवां से,
विविध प्रकार के फूलों की मालाओं से, किंकिरात, अगस्ति, कुन्द, चम्पा, नीलकमल, रक्तकमल,
कुई, काश, खजूर, आम, पलाश, अशोक, मैनफल, बिल्व, कनैर, किरातक, कदम्ब, मौलसिरी,
मनीम, सेन्दुआर, जूरी, बकायन, गुगुलि, बिन्दुक आदि फूलों के समूहों से, मेंहदी, पाटल, आम,
अमडा, गव्य और हरे बहेडों के फूलों से, शाल, ताल ओर तमालो के लता, फूल ओर पल्लवो से,
कोमल-कोमलकलियों से, काश्मीर केसरयुक्त आम के बौरों से, केवडे, कमल और इलायची की
मंजरियों से, इनके अतिरिक्त धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दर्पण, छत्र चवर, आरती, पुष्पांजलि,
प्रदक्षिणा, नमस्कार आदि सौन्दर्ययुक्त सब उपचारो से स्वयं अपने अर्पण द्वारा भी जगत में जो जो
विभव प्रसिद्ध है उपकरण बनाये गये उनसे भव्यभक्ति से प्रह्लाद ने अपने अन्तःपुर मेँ मन से अपने
स्वामी भगवान की पूजा की