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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, Verses 17–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, verses 17–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 17-19

संस्कृत श्लोक

अथ देवगृहे तस्मिन्बाह्यार्थैः परिपूर्णया । पूजया पूजयामास दानवेशो जनार्दनम् ॥ १७ ॥ बहिर्द्रव्यैरनेनैव क्रमेण परमेश्वरम् । पुनःपुनः पूजयित्वा तुष्टिमान्दानवोऽभवत् ॥ १८ ॥ ततस्ततः प्रभृत्येव प्रह्रादः परमेश्वरम् । तथैव प्रत्यहं भक्त्या पूजयामास पूर्णया ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त दानवराज प्रह्लाद ने उस देवगृह में बाह्य समामग्री से पूर्णं पूजा से भगवान विष्णु की पूजा की | इसी मानस पूजा में कहे गये क्रम से बाह्य पदार्थो से परमेश्वर की बार-बार पूजा कर दावनराज प्रह्लाद को अत्यन्त संतोष हुआ । तदुपरान्त तभी से लेकर प्रह्लाद प्रतिदिन पूर्वोक्त पूर्ण भक्ति से भगवान की पूजा करने लगा