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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, Verses 25–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, verses 25–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 25-28

संस्कृत श्लोक

विबुधा ऊचुः । किमेतद्भगवन्दैत्या विरुद्धा ये सदैव ते । ते हि तन्मयतां याता मायेयमिति भाव्यते ॥ २५ ॥ क्व किलात्यन्तदुर्वृत्ता दानवा दलिताद्रयः । क्व पाश्चात्यमहाजन्मलभ्या भक्तिर्जनार्दने ॥ २६ ॥ प्राकृतो गुणवाञ्जात इत्येषा भगवन्कथा । अकालपुष्पमालेव सुखायोद्वेजनाय च ॥ २७ ॥ नोपपन्नं हि यद्यत्र तत्र तन्न विराजते । मध्ये काचकलापस्य महामूल्यो मणिर्यथा ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ यह क्या बात है, जो दैत्य सदा ही आपके विरुद्ध रहनेवाले आपके भक्त हो गये हैं। मालूम होता है यह माया है । कहाँ तो अत्यन्त दुष्ट दानव, जिन्होंने आपके भक्तों, देवता और मुनियों के निवासभूत पर्वत तक तोड़-फोड़ डाले थे और कहाँ अन्तिम उत्तम जन्म में प्राप्त होने वाली भगवान जनार्दन की भक्ति | हे भगवन्‌, पामर पुरुष गुणवान हो गया यह कथा औत्पातिकी अकाल पुष्पमाला के समान सुख के लिए ओर उद्वेग के लिए भी हे । जैसे काँचों के बीच में बहुमूल्यमणि शोभित नहीं होती वैसे ही जो जहाँ पर उचित न हो वह वहाँ शोभित नहीं होता