Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, Verses 20–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, verses 20–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 20-24
संस्कृत श्लोक
अथ तस्मिन्पुरे दैत्यास्ततः प्रभृति वैष्णवाः ।
सर्व एवाभवन्भव्या राजा ह्याचारकारणम् ॥ २० ॥
जगाम वार्ता गगनं देवलोकमथारिहन् ।
विष्णोर्द्वेषं परित्यज्य भक्ता दैत्याः स्थिता इति ॥ २१ ॥
देवा विस्मयमाजग्मुः शक्राद्याः समरुद्गणाः ।
गृहीता वैष्णवी भक्तिर्दैत्यैः किमिति राघव ॥ २२ ॥
क्षीरोदे भोगिभोगस्थं विबुधा विस्मयाकुलाः ।
जग्मुरम्वरमुत्सृज्य हरिमाहवशालिनम् ॥ २३ ॥
तत्रैनं दैत्यवृत्तान्तं कथयामासुरस्य ते ।
पप्रच्छुश्चैनमासीनमपूर्वाश्चर्यविस्मयम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
बड़ा आश्चर्य हुआ कि दैत्यों ने किस हेतु विष्णु भगवान की भक्ति अपनाई है ? आश्चर्य में डूबे हुए
देवता अमरावती का त्यागकर क्षीर सागर में शेषशय्या पर विराजमान युद्धविजयी श्रीहरि के समीप
गये । वहाँ पर देवताओं ने श्रीहरि को यह वृत्तान्त कहा ओर शेषशय्या पर बैठे हुए भगवान से यह अपूर्व
अद्भुत आश्चर्य पूछा