Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 30
उन्तीसर्वोँ सर्ग समाप्त तीसवाँ सर्ग हिरण्यकशिपु का पराक्रम, प्रह्लाद आदि पुत्रों की उत्पत्ति, नृसिंह द्वारा वध और शोकपूर्वक और्ध्वदैहिक क्रिया ।
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- Verse 1इस प्रकार केवल काकतालीय न्याय से प्रवृत्त हुए तथा शास्त्र ओर आचार्य के उपदेश से परिपुष्ट…
- Verse 2नारायण के समान पाताल में पराक्रमी हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य था । उसने अपने पराक्रम से देवत…
- Verse 3राजहंस भ्रमर से छीनकर ले लेता हे वैसे ही उसने तीनों भुवनो पर आक्रमण कर इन्द्र से तीनों लो…
- Verses 4–5जैसे हाथी हंसों को हटाकर कमलिनी मेँ भ्रमरो का राज्य करता हे वैसे ही उसने देवता ओर असुरो क…
- Verse 6जैसे तेज में बढी-चढी ओर अवस्था में नयी, आकाश में फैलने से शोभित होनेवाली सूर्य की हजार कि…
- Verse 7जैसे बहुमूल्य मणियों में कौस्तुभ मणि प्रधान हे वैसे ही उनके बीच में प्रह्ाद नाम का पुत्र…
- Verse 8जैसे सब प्रकार की सुन्दरता से युक्त बसन्त से वर्ष सुशोभित होता हे वैसे ही उस पुत्र से हिर…
- Verse 9तदनन्तर पुत्रं की सहायता, सेना और धनसम्पत्ति से युक्त वह दैत्य साठ वर्ष के हाथी के समान म…
- Verse 10जैसे प्रलय के बारह सूर्य बढ़ रहे ताप से ओर अपनी प्रखर किरणों से तीनों जगतां को सन्तप्त कर…
- Verse 11जैसे दुलार से बिगड़े हुए बालक के मर्यादा के उल्लंघन से बन्धु - बान्धव दुःखी होते हे वैसे…
- Verse 12तदनन्तर उन्होने दैत्यराजरूपी गजराज के वध के लिए ब्रह्माजी से प्रार्थना की । ठीक ही है, बा…
- Verses 13–19तदनन्तर भगवान हरि ने नरसिंह शरीर धारणकर जैसे हाथी घोडे को कटकट शब्द के साथ काट डालता है व…
- Verse 20जैसे सब प्राणियों के प्रलय के अन्त में अग्नि सम्पूर्ण जगतों को जला डालती है वैसे ही इस प्…
- Verses 21–28प्रलयकाल के संवर्तं नामक मेघो के गर्जन से व्याकुल जलप्रलय के समान मेच गर्जन के तुल्य घनघो…