Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 30, Verses 13–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 30, verses 13–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 13-19
संस्कृत श्लोक
ततः प्रलयपर्यस्तजगद्धर्घरजृम्भितम् ।
दिग्दन्तिदशनप्रख्यनखवज्रादिजृम्भितम् ॥ १३ ॥
स्थिरविद्युल्लताजालभासुरद्विजमण्डलम् ।
दशदिक्कोटरोद्भान्तज्वलज्ज्वलनकुण्डलम् ॥ १४ ॥
समस्तकुलशैलेन्द्रपिण्डपीठोद्भटोदरम् ।
दोर्द्रुमाधूतनिर्धूतस्फुरद्ब्रह्माण्डखर्परम् ॥ १५ ॥
वदनोदरनिष्क्रान्तवातोत्सारितपर्वतम् ।
त्रिजगद्दहनोद्युक्तकोपकल्पाग्निगर्वितम् ॥ १६ ॥
सटाविकटपीनांसस्पन्दप्रेरितभास्करम् ।
रोमकूपलसद्वह्निपुञ्जापिञ्जरपर्वतम् ॥ १७ ॥
कुलाचलमहाकुड्यघटनोद्भटदिक्तटम् ।
सर्वावयवनिष्क्रान्तपट्टिशप्रासतोमरम् ॥ १८ ॥
नारसिंहं वपुः कृत्वा माधवोऽहन्महासुरम् ।
लसत्कटकटारावं तुरङ्गममिव द्विपः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर भगवान हरि ने नरसिंह
शरीर धारणकर जैसे हाथी घोडे को कटकट शब्द के साथ काट डालता है वैसे ही उसे विदीर्ण कर
दिया । वह नरसिंह शरीर प्रलयकाल में ढह रहे जगत के समान घर्घर शब्द कर रहा था, उसमें दिग्गजों
के दतां के सदुश नख वज्र आदि के तुल्य बढ़े थे, उसकी दन्त पंक्तियाँ स्थिर विद्युत्ूलता के तुल्य
चमकीली थी, दस दिशारूपी कोटरों में घूम रही जलती अग्निर्यो ही उसके कुण्डल थे, उसका उदर सब
कुलाचलों की पिण्डाकार स्थिति के समान भीषण था, उसके बाहुरूपी वृक्षों के हिलने-डुलने से उठा
हुआ ब्रह्माण्डरूपी खप्पर विदीर्ण हो रहा था, मुख द्वारा पेट से निकले हुए उसके श्वास वायुओं से पर्वत
एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाये गये थे, तीनो जगतो को जलाने के लिए तत्पर कोपरूपी प्रलयाग्नि
से वह अत्यन्त गर्वीला था, अयाल से भयंकर विशाल कन्धों के कम्प से उसने सूर्य को विचलित कर
दिया था, उसके रोमकूपों में दैदीप्यमान अग्निराशि से पर्वत पिघल गये थे, उसमें उखाड़ गये कुलाचलों
से बड़ी भारी दीवार की रचना में मानों दिकृतट उद्धत थे ओर उसके सब अवयवो से पट्टिश, प्रास, तोमर
आदि विविध आयुध उत्पन्न हुए थे