Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 30, Verses 21–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 30, verses 21–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 21-28
संस्कृत श्लोक
नृसिंहमारुते तस्मिन्भृशं क्षोभमुपागते ।
विस्फूर्जितघनास्फोटैरेकार्णव इवाकुले ॥ २१ ॥
दुद्रुवुर्दानवौघास्ते दिग्ज्वलन्मशका इव ।
उपाययुरदृश्यत्वं दीपा इव गतत्विषः ॥ २२ ॥
अथ विद्रुतदैत्येन्द्रं दग्धान्तःपुरमण्डलम् ।
बभूव पातालतलं कल्पक्षुण्णजगत्समम् ॥ २३ ॥
अकालकल्पान्तविधौ हत्वा दैत्यं शनैर्विभौ ।
क्वापि याते समाश्वस्तसुरसंरम्भपूजिते ॥ २४ ॥
मृतशिष्टा दनुसुताः प्रह्रादपरिपालिताः ।
दग्धं तं देशमाजग्मुः सरः शुष्कमिवाण्डजाः ॥ २५ ॥
तत्र कालोचितां कृत्वा स्वनाशपरिदेवनाम् ।
और्ध्वदेहिकसत्कारं चक्रुः प्रेतेषु बन्धुषु ॥ २६ ॥
हतबन्धुजनं प्लुष्टबन्धुबान्धवमण्डलम् ।
शनैराश्वासयामासुर्मृतशिष्टं स्वकं जनम् ॥ २७ ॥
चित्रार्पितोपमदुराकृतयो निरीहा दीनाशया हि महताम्बुरुहोपमानाः ।
शोकोपतप्तमनसोऽसुरनायकास्ते दग्धद्रुमा इव निरस्तविकारमासन् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रलयकाल के संवर्तं नामक मेघो के गर्जन से व्याकुल जलप्रलय के समान मेच गर्जन के तुल्य घनघोर
ठोकने से उस नृसिंहरूपी वायु के अत्यन्त क्षोभ को प्राप्त होने पर दिशाओं में जल रहे मच्छरों के समान
दानवो के झुण्ड के झुण्ड भाग गये ओर कान्तिवाले दीपको के समान अदृश्य हो गये।
तदनन्तर पाताल, जहाँ से दैत्यनायक भाग गये थे और सब अन्तःपुर जल गये थे, प्रलय में बरबाद
हुए जगत के तुल्य हो गया । अकाल के प्रलय के तुल्य भीषण युद्ध में हिरण्यकशिपु को मारकर स्वस्थ
हुए देवताओं द्वारा बड़े आदर के साथ पूजित भगवान नृसिंह के धीरे-धीरे वाणी के अगोचर अपने पद
को जाने पर मरने से बचे हुए दानव प्रह्लाद के संरक्षण में जैसे पक्षी सूखे तालाब में जाते हैं वैसे ही अपने
उस जले हुए देश में गये । वहाँ पर आत्मीय बन्धु-बान्धवों का नाश प्रयुक्त समयोचित विलाप कर मरे
हुए बन्धुओं का उन्होने ओध्वदिहिक सत्कार किया । जिनके बन्धु-बान्धव मारे जा चुके थे और अधिकांश
बन्धु-बान्धव जीते-जी जलाये गये थे, ऐसे मरने से बचे हुए आत्मीयजनों को उन्होंने धीरे-धीरे
आश्वासन दिया । चिन्तावश निश्चेष्ट अतएव चित्रलिखित के तुल्य दुःखित आकृतिवाले दीन-मलिन
चित्त अतएव तुषार से नष्ट -भ्रष्ट किये गये कमलो के सदृश शोक सन्तप्त अन्तःकरणवाले वे प्रह्लाद
आदि असुरनायक, जिनके शाखा, पत्ते आदि जल गये हो, ऐसे वृक्षों के समान निश्चेष्ट हो गये । (ठुंठ
वृक्षों का वायु से न हिलना प्रसिद्ध ही है ।)