Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 16
18 verse-groups
- Verse 1सोलहवाँ सर्ग ध्येय-ज्ञेयभेद से वासना त्याग का वर्णन, उससे जीवन्मुक्त और विदेहो के लक्षण क…
- Verse 2हे प्रभो, यदि मैं अहंकार का त्याग करूँ, तो मुझे देह नामक अवयव संनिवेश का पूर्णरूप से त्या…
- Verse 3जैसे जानु के तुल्य विशाल तने से वृक्ष धारण किया जाता है वैसे ही अहंकार से यह शरीर धारण कि…
- Verse 4अहंकार का विनाश होने पर यह शरीर अवश्य नष्ट हो जाता है, जैसे कि तने के आरा द्वारा काटे जान…
- Verse 5इसलिए मैं इस अहंकार का केसे त्याग करूँ कैसे जीऊँ, हे वक्ता ओं म श्रेष्ठ मुनिजी, इस विषय क…
- Verse 6श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, विद्वानों द्वारा ज्ञेय ओर ध्येय भेद से द…
- Verses 7–9उनमें प्रथम के स्वरूप का पहले विचार कर निश्चय करना चाहिये, ऐसा कहते है। इस देह, इन्द्रिय…
- Verse 10प्रथम वासनाक्षय का उपपादन करते हैं। सारे जगत को ब्रह्मरूप से जानकर भूमिका अभ्यास के क्रम…
- Verse 11अहंकारमयी वासना का त्याग कर जो लोकसंग्रहोचित व्यवहार से स्थित रहता है, ध्येय वासना त्यागव…
- Verses 12–13हे रघुनंदन, मूल अज्ञान के साथ कलनारूप वासना का त्यागकर जो पुरुष शम को प्राप्त हुआ, उसे ज्…
- Verse 14ज्ञेय वासना त्याग करके शान्ति को प्राप्त हुए विदेह मुक्त पुरुष परब्रह्म में ही स्थित रहते…
- Verses 15–16हे श्रीरामचन्द्रजी, ये पूर्वोक्त दोनों ही त्याग समान हैं, दोनों मुक्तपद में स्थित हैं | य…
- Verses 17–18एक सदेह निर्मुक्त पुरुष सन्तापरहित स्थित रहता है, दूसरा शरीर त्याग करके मुक्त हुआ पुरुष व…
- Verse 19जिस पुरुष को इष्ट ओर अनिष्ट वस्तुओं में इच्छा ओर द्वेष नहीं होते और जो पुरुष अज्ञानी की द…
- Verse 20शरीर में और शरीर के सम्बन्ध में "अहम्" (मैं), मम” (मेरा) ऐसी हेयोपादेय कलना जिस पुरुष के…
- Verse 21हर्ष, रोष, भय, क्रोध, काम और कार्पण्य दृष्टियों का जिसके हृदय में स्पर्श नहीं होता, वह मु…
- Verse 22जो पुरुष जिसकी पदार्थो मे आस्था शान्त हो गई, ऐसे चित्त से युक्त होकर, जाग्रत में भी सदा स…
- Verse 23श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनिजी के ऐसा कहने पर दिन बीत गया । सूर्य अस्त हो गया । मुनियों क…