Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, Verses 17–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 17,18
संस्कृत श्लोक
एकः सदेहो निर्मुक्तस्तिष्ठत्यपगतज्वरः ।
त्यक्तदेहो विमुक्तोऽन्यो वर्ततेऽज्ञेयवासनः ॥ १७ ॥
आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतम् ।
न हृष्यति ग्लायति यः स मुक्त इति होच्यते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
एक सदेह निर्मुक्त पुरुष सन्तापरहित स्थित रहता है, दूसरा शरीर त्याग करके मुक्त हुआ पुरुष
वासना शून्य होकर रहता है । निरन्तर यथा समय सुख-दुःखों के आने पर जिसको न हर्ष होता हे,
न विषाद होता है, वह मुक्त कहा जाता है