Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
जानुस्तम्भेन महता धार्यते सुतरुर्यथा ।
अहंकारेण देहोऽयं तथैव किल धार्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जानु के तुल्य विशाल तने से वृक्ष धारण किया
जाता है वैसे ही अहंकार से यह शरीर धारण किया जाता हे