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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 61

साठवाँ सर्ग समाप्त डुकसठवाँ सर्ग मुक्ति के योग्य राजससात्त्विक लोगों की प्रशंसा और उनके विवेक वैराग्य के क्रम का उपदेश |

18 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जो विचारणा की योग्यता को प्राप्त पुरुष राज…
  2. Verses 2–3जैसे आकाश मेघो से की गई मलिनता को प्राप्त नहीं होता वैसे ही वे भी मानसिक दुःख को प्राप्त…
  3. Verse 4हे श्रीरामचन्द्रजी, राजससात्त्विक पुरुष की बुद्धि शान्ति आदि सुधा के बढ़ने पर वृद्धि को प…
  4. Verses 5–9जैसे चन्द्रमा शीतलता का त्याग नहीं करता वैसे ही वे शीतलता के समान स्थित सौम्यता का आपत्ति…
  5. Verses 10–11इस प्रकार भावना करनेवाले पुरुष को अत्यन्त आदर के साथ सब वस्तुओं की विविध निमित्तो से उपपन…
  6. Verses 12–13आगे कहे जानेवाले विचाररूप ज्ञान का असीम परब्रह्मरूप वस्तु को प्राप्त करने के लिए साधु सती…
  7. Verse 14सब प्रिय वस्तुओं का विच्छेद संसारमात्र के लिए अवश्यंभावी है, ऐसा सदा विचार करना चाहिये ।…
  8. Verse 15आभ्यन्तर अहंकार के उससे बाहरी शरीर के, उससे भी बाहरी पुत्र, मित्र आदि संसार के, जो तीन सा…
  9. Verse 16सत्य का ही अवलोकन करना चाहिये, ऐसा जो कहा उसमें उपाय कहते हैं। अस्थिर शरीर का और अहंकार क…
  10. Verse 17हे
  11. Verse 18जो चित्‌ विशाल भुवन के भूषणरूप आकाश में स्थित सूर्य में हे, वही चित्‌ पृथिवी के विवर के म…
  12. Verse 19हे अनघ, जैसे यर्हो पर घटाकाश ओर महाकाश का परमार्थतः भेद नहीं है वैसे ही शरीर में स्थित जी…
  13. Verse 20तिक्त, कडुआ आदि रस के भेद को जाननेवाले सभी प्राणियों की अनुभूति एक ही होती है, अतः चिन्मा…
  14. Verse 21चेतनों में जैसे चित्‌ का भेद नहीं है, वैसे ही सब वस्तुओं में तत्स्वरूप का भेद नहीं है, ऐस…
  15. Verse 22तब शास्त्रीय बुद्धि कैसी है ? ऐसा प्रश्न होने पर उसे कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, जो उत्…
  16. Verse 23वह न सत्‌ है और न असत्‌ है, ऐसा जो कहा, उसका उपपादन करते हैं। चूँकि मोक्ष होने के पहले अभ…
  17. Verse 24ज्ञान की सार्थकता का विचार करने पर भी मोह आदि की सत्ता या असत्ता नहीं कही जा सकती, अतएव इ…
  18. Verse 25यदि जगत असत्‌ है, तो यहाँ पर मोह कैसे यदि वह सत्‌ है, तो मोह का कारण कैसे ? इसलिए सदा शान…