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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

स्मर्तव्यं सम्यगेवेदं ज्ञानमर्थमनन्तकम् । कोऽहं कथमिदं जातं संसाराडम्बरं विभो ॥ १२ ॥ प्रविचार्य प्रयत्नेन प्राज्ञेन सह साधुभिः । नच कर्मसु मङ्क्तव्यं नानर्थेन सहावसेत् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

आगे कहे जानेवाले विचाररूप ज्ञान का असीम परब्रह्मरूप वस्तु को प्राप्त करने के लिए साधु सतीर्थ्यों के साथ विधिवत्‌ प्राप्त हुए सेवा आदि प्रयत्न द्वारा प्रसन्न किये हुए गुरु से हे प्रभो, मैं कौन हूँ", यह संसाराडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ, इत्यादि सविनय प्रश्नपूर्वक विचारकर स्मरण करना चाहिए । कर्मो मे निमग्न नहीं होना चाहिये ओर अनर्थकारी लोगों के साथ संगति भी नहीं करनी चाहिये