Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सर्वेषामेव भूतानां तिक्तकट्वादिभेदिनाम् ।
एकत्वादनुभूतेर्हि कुतश्चिन्मात्रभिन्नता ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
तिक्त, कडुआ आदि रस के भेद को
जाननेवाले सभी प्राणियों की अनुभूति एक ही होती है, अतः चिन्मात्र में भेद कैसे भाव यह कि जैसे
एक पुरुष से आस्वादनीय तिक्त, कडुआ आदि रस का भेद होने पर भी उनके अनुभव का भेद नहीं है
वैसे ही देहादि का भेद होने पर भी चिन्मात्र में भेद नहीं हे