Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, Verses 5–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, verses 5–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 5-9
संस्कृत श्लोक
आपद्यपि न मुञ्चन्ति शशिवच्छीततामिव ।
प्रकृत्यैव विराजन्ते मैत्र्यादिगुणकान्तया ॥ ५ ॥
नवस्तबकभाविन्या लतयेव वनद्रुमाः ।
समाः समरसाः सौम्याः सततं साधुसाधवः ॥ ६ ॥
अब्धिवद्भुतमर्यादा भवन्ति भवता समाः ।
अतस्तेषां महाबाहो पदमापदवासनम् ॥ ७ ॥
सततं तत्तु गन्तव्यं गन्तव्यं नापदर्णवे ।
तथा तथेह जगति विहर्तव्यमखेदिना ॥ ८ ॥
आत्मोदयाश्च वर्धन्ते यथाऽराजससात्त्विकाः ।
अचिन्त्यगत्या सच्छास्त्रं विचार्य च पुनःपुनः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चन्द्रमा शीतलता का त्याग नहीं करता वैसे ही वे
शीतलता के समान स्थित सौम्यता का आपत्ति में भी त्याग नहीं करते हें । मत्री आदि गुणों से मनोहर
प्रकृति से ही वे ऐसे विराजमान रहते हैं जैसे कि नूतन गुच्छों से शोभित लता से वन के वृक्ष शोभित होते
हैं । सब पर समान दृष्टि रखनेवाले, एकमात्र परमात्मा में अनुराग रखनेवाले, सदा सौम्य, साधुओं से
भी बढ़कर साधु, समुद्र के तुल्य मर्यादा धारण किये हुए पुरुष आपके तुल्य हैं । इसलिए हे महाबाहो,
आपत्तियों का अनधिकरण उनका जो स्थान वही गन्तव्य है। आपत्तियों के सागर में जाना उचित नहीं
है। खेदरहित आपको इस जगत में वैसे बर्ताव करना चाहिये जैसे कि रजोगुणरहित सात्विक आत्मानन्द
लाभ बढ़े एवं मूढ़ों के विचारणीय विषयों के परित्याग द्वारा बारम्बार सत् शास्त्रों का विचार करना
चाहिये