Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

न खेदमभिगच्छन्ति व्योमभागो मलं यथा । नापदा म्लानिमायान्ति निशि हेमाम्बुजं यथा ॥ २ ॥ नेहन्ते प्रकृतादन्यत्ते नान्यत्स्थावरो यथा । रमन्ते स्वसदाचारैः स्वार्थेभ्यः पादपा यथा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे आकाश मेघो से की गई मलिनता को प्राप्त नहीं होता वैसे ही वे भी मानसिक दुःख को प्राप्त नहीं होते हैं, जसे सुवर्णं का कमल रात्रि में म्लान नहीं होता वैसे ही वे शारीरिक दुःख को प्राप्त नहीं होते हैं। जैसे स्थावर वृक्ष आदि प्रारब्ध भोग से अतिरिक्त कोई दूसरी चेष्टा नहीं करते हैं वैसे ही वे भी ज्ञान ओर ज्ञानसाधनों की सिद्धि के सिवा अन्य वस्तु नहीं चाहते हैं और जैसे वृक्ष अपने पुष्प, फल आदि से रमता हे वैसे ही वे भी अपने सदाचारों से रमते हैं