Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 37
छतीसर्वोँ सर्ग समाप्त सैंतीसवाँ सर्ग अविद्या, काम ओर कर्म से आत्मा के अनात्मभाव की प्राप्ति, तदनन्तर ज्ञान का, मन का अभाव ओर निष्कर्मता से स्वरूपावस्थिति का वर्णन |
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- Verse 1चिद्रूपस्थिति ही जगत की स्थिति है, क्योकि चित् का ही जगद्रूप से अवस्थान है, यह कहने के ल…
- Verses 2–3परस्पर एक-दूसरे के प्रति कारणता को प्राप्त हुआ यह सारा जगत अधिष्ठान चैतन्य से ही उत्पन्न…
- Verses 4–5जैसे निराकार आकाश में धूप से मृग मरिचिका दिखाई देती हे वैसे ही निराकार चित्तत्त्वे ये सृष…
- Verse 6असत् है, किन्तु अनिर्वचनीय है । जैसे कि कटक आदि में सुवर्णता उनसे अतिरिक्त नहीं है और उन…
- Verse 7यदि कोई शंका करे कि जगत् ब्रह्म का विवर्त है, ऐसा चुना जाता है । प्रत्यक् चैतन्य का तो…
- Verse 8यदि कोई शंका करे, प्रत्यगात्मा बहुत हैं, ब्रह्म एक है, इसलिए उन दोनों की एकता कैसे ? तो इ…
- Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, अन्य वस्तु का अस्तित्व और अभाव, शुभ और अशुभ सृष्टियाँ मायिक दृष्टि से…
- Verse 10पूर्वोक्त पद्य में अथवा55त्मनि' से जो दूसरा पक्ष कहा गया है, उसकी युक्ति और प्रयोजन द्वार…
- Verse 11इसलिए यह अभीष्ट है और यह अनिष्ट है, इस प्रकार के विकल्प आत्मा को स्पर्श नहीं करते इसलिए इ…
- Verse 12हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त प्रकारों से अन्य साफल्य आदि की कल्पना हे ही नहीं । यही ब्रह…
- Verse 13अज्ञानितादशा में भी भौतिक शरीर ग्रहण द्वारा कर्तृत्व होने पर भूतों से भूतों का निर्माण कर…
- Verse 14विस्तारपूर्वक कहे गये अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार करते हैं । जिस साधन से अपरिच्छिन्न सु…