Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अत इदमीहितमिदमनीहितमित्यात्मानं न स्पृशन्ति विकल्पाः ।
अतो निरिच्छतायामात्मा न
किंचिदपि करोति कर्तृकरणकर्मणामेकत्वात् न क्वचित्तिष्ठत्याधाराधेययोरेकत्वात् नच निरिच्छस्यात्मनो नैष्कर्म्यमभिमतम् द्वितीयायाः कल्पनाया अभावात् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए यह अभीष्ट है और यह अनिष्ट है, इस प्रकार के
विकल्प आत्मा को स्पर्श नहीं करते इसलिए इच्छा न होने पर आत्मा कुछ भी नहीं करता । करे भी
कैसे ? कर्ता, करण और कर्म सभी एक ही हैं और न कहीं पर स्थित होता है, क्योकि आधार और
आधेय एक ही है। नैष्कर्म्य की सिद्धि भी कर्म का फल नहीं हो सकता, क्योकि कर्म की सिद्धि होने पर
नैष्कर्म्य सिद्धिरूप फल होता हे । इच्छारहित में कर्म की सिद्धि ही नहीं है, इसलिए इच्छारहित आत्मा
का नैष्कर्म्य भी अभीष्ट नहीं है, क्योकि कर्म आदि दूसरी कल्पना का अभाव हे