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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

नानैकत्वादतीतात्तु सर्वंगादमलात्मनः । द्वितीया कलना नास्ति काचिन्नेतरथा क्वचित् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे, प्रत्यगात्मा बहुत हैं, ब्रह्म एक है, इसलिए उन दोनों की एकता कैसे ? तो इस पर नानात्व ओर एकत्व मिथ्या है, इसलिए उक्त शंका उचित नहीं है, ऐसा कहते हैं। बहुत्व ओर एकत्व से परे, सर्वव्यापक, निर्मल आत्मा से अतिरिक्त कहीं कोई दूसरी कल्पना नहीं है। भाव यह कि नानात्व ओर एकत्व यदि सत्य होते, तो उनकी एकता न हो सकती । वे मायिक हे, अतएव उक्त दोष नहीं है