Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्थं स्थिरतराकाराः संसारावलयोऽभितः ।
स्वभावाद्ब्रह्मणः सर्वाः पुनरायान्ति यान्ति च ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
चिद्रूपस्थिति ही जगत की स्थिति है, क्योकि चित् का ही जगद्रूप से अवस्थान है, यह कहने के
लिए पूर्वोक्त विषय का अनुवाद करते हैं।
इस प्रकार चारों ओर स्थित, स्थिर आकारवाली, ब्रह्म की स्वभावभूत ये सब संसार पंक्तिर्यो फिर
आती ओर जाती हे
सर्ग सन्दर्भ
छतीसर्वोँ सर्ग समाप्त सैंतीसवाँ सर्ग अविद्या, काम ओर कर्म से आत्मा के अनात्मभाव की प्राप्ति, तदनन्तर ज्ञान का, मन का अभाव ओर निष्कर्मता से स्वरूपावस्थिति का वर्णन |