Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
व्योमन्येव निराकारे निदाघात्सरितो यथा ।
लक्ष्यन्ते तद्वदेवेमाश्चित्तत्त्वे सृष्टिदृष्टयः ॥ ४ ॥
यथा मदवशादात्मा सोऽन्यवत्प्रतिभासते ।
तथैव चित्त्वाच्चिद्धातुः स एवाऽस इव स्थितः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे निराकार आकाश में धूप से मृग मरिचिका दिखाई देती हे वैसे ही निराकार
चित्तत्त्वे ये सृष्टियाँ दिखाई देती है । जैसे नशे के कारण चक्कर न खाता हुआ भी अपना आत्मा चक्कर
खाताहुआ-सा प्रतीत होता हे वैसे ही चित् होने के कारण चिन्मय वही वस्तु अचित्-सी स्थित हैं