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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

गत्वा सुदूरमपि यत्नवता जवेन नासाद्यते तदिह येन सुपूर्णतैति । मत्वेति मा व्रज पदार्थगणान्धिया त्वं न त्वं त्वमेव परमार्थतया चिदात्मा ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

विस्तारपूर्वक कहे गये अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार करते हैं । जिस साधन से अपरिच्छिन्न सुखलाभ द्वारा पूर्णकामता प्राप्त होती है, वह साधन बड़े वेग से दिशाओं के अन्त तक भी घूमकर प्रचुर यत्न करनेवाले पुरुष को भी प्राप्त नहीं होता । ऐसा निश्चयकर आप मन से भी बाह्य पदार्थों की ओर कदम न उठाइये । इस प्रकार सब क्रियाओं का त्यागकर अपने स्थान में ही आपको परम पुरुषार्थ प्राप्त हो जायेगा, आप केवल पराग्रूप से पृथक्‌ ही नहीं हैं वरन परमार्थरूप से दृष्ट पू्णनिन्द चिदात्मा परम पुरुष भी हैं