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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

यस्मादात्मनो व्यतिरिक्ते वस्तुनि सिद्धे सति तत्रेच्छा प्रवर्तते । यत्र स्वात्मनो व्यतिरिक्तं न किंचिदपि संभवति तत्रात्मा किमिव वाञ्छन्किमनुस्मरन्धावतु किमुपैतु ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त पद्य में अथवा55त्मनि' से जो दूसरा पक्ष कहा गया है, उसकी युक्ति और प्रयोजन द्वारा गद्यों से उपपत्ति करते हैं। आत्मा से अतिरिक्त वस्तु के सिद्ध होने पर उसमें इच्छा होती है यानी जब आत्मरूप सृष्टि आत्मा में ही है यह पक्ष है, तब आत्मा से अन्य सृष्टि नहीं है। इच्छापूर्वक ही सृष्टि होती है, क्योकि “सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय" इत्यादि श्रुति है। आत्मा में आत्मा की इच्छा का होना असिद्ध है, आत्मा से पृथक्‌ कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं है, जिसकी इच्छा से आत्मा सृष्टि करके भी किस फल के लिए आत्मा प्रयत्न करे और प्रयत्न करके भी क्या फल पाये ?