Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 90

नवासीवाँ सर्ग समाप्त नब्बेवाँ सर्ग भरतमुनि के शाप से उनके देहों के नष्ट होने पर भी उनके मनक तन्मयता नष्ट न हुई, यह वर्णन ।

9 verse-groups

  1. Verses 1–2भानु ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, तदनन्तर इन्द्रनामक विट के ऐसा कहनेपर कमल के तुल्य नेत्रवाले उ…
  2. Verse 3राजा ने कहा : हे भगवन्‌, आप सम्पूर्ण धर्म के मर्म को जाननेवाले है । में मेरी पत्नीका अपहर…
  3. Verses 4–5श्रेष्ठ राजा के ऐसा कहनेपर मुनिवर भरत ने उस दुरात्मा के पापका पूर्वापर से यथायोग्य विचार…
  4. Verses 6–8हे
  5. Verse 9भानु ने कहा : ब्रह्मन्‌, अत्यन्त प्रगाढ स्नेह से जिनका मन सम्बद्ध है, ऐसे वे दोनों शाप से…
  6. Verse 10तदनन्तर दृढ विषयराग से बंधे हुए वे दोनों मृगयोनि में गये, तदनन्तर वे दृढ़ विषयराग से बद्ध…
  7. Verse 11तदनन्तर बहुत जन्मों के बाद हे प्रभो, हमारे ब्रह्माण्ड में परस्पर सम्बन्ध की भावनावाले वे…
  8. Verses 12–13भरत का वह शाप उनके शरीरमात्र के विनाश में समर्थ हुआ और मनके निग्रहमें समर्थ नहीं हुआ । वे…
  9. Verse 14अकृत्रिम प्रेमरस से पूर्ण उनके उस सुन्दर स्नेह को देखकर वृक्ष भी प्रेमरस से युक्त होकर श्…