Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 90, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 90, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
भारतोऽपि तयोः शापः स समर्थो बभूव ह ।
शरीरमात्राक्रमणे न मनोनिग्रहे प्रभो ॥ १२ ॥
तावद्यापि हि तेनैव मोहसंस्कारहेतुना ।
यत्र यत्र प्रजायेते भवतस्तत्र दम्पती ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
भरत
का वह शाप उनके शरीरमात्र के विनाश में समर्थ हुआ और मनके निग्रहमें समर्थ नहीं हुआ ।
वे आज भी उसी मोह संस्कार के कारण जहाँ-जहाँ उत्पन्न होते हैं, वहाँ दम्पती ही होते
हैं