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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 90, Verses 4–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 90, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

इत्युक्तो राजसिंहेन भरतो मुनिसत्तमः । यथावत्प्रविचार्याशु पापं तस्य दुरात्मनः ॥ ४ ॥ सहानया दुष्कृतिन्या भर्तृद्रोहाभिभूतया । विनाशं व्रज दुर्बुद्धे इति शापं विसृष्टवान् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ राजा के ऐसा कहनेपर मुनिवर भरत ने उस दुरात्मा के पापका पूर्वापर से यथायोग्य विचार कर, हे दुर्बुद्धे ! पति के द्रोह से पतित इस पापिन के साथ तू विनष्ट हो जा", ऐसा शाप दे दिया