Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 79
अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त उन्नासीवों सर्ग कर्कटी का अनात्मज्ञ पुरुषों के लिए वज के तुल्य ओर आत्मज्ञानी पुरुषों के लिए मनोज्ञ बहत्तर प्रश्न करना ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त कथन के अनन्तर राजा के अपने प्रश्नों…
- Verse 2राक्षसी ने कहा : राजन्, एक होते हुए भी उपाधिवश अनेक संख्यावाले, (अपरिच्छिन्न होने के कार…
- Verses 3–12कौन वस्तु आकाशरूप (शून्य) ओर अनाकाशरूप (अशून्य) है ? लौकिक पुरुषों की दृष्टि में जो कुछ न…
- Verses 13–18किसने स्वस्थ ओर जीवित होते हुए भी अपने आत्मा का अत्यन्त विस्मरण कर दिया ? कौन अणु अपने भी…
- Verse 19अपने स्वरूप के आच्छादन में असमर्थ किस अणुसे यह सम्पूर्ण जगत् आच्छादित (व्याप्त) है लय से…
- Verse 20जिसके अवयव उत्पन्न ही नहीं हुए हैं, ऐसा कौन अणु सैकड़ों हाथ ओर लोचनो से युक्त है ? वह कोन…
- Verses 21–23किस अणु में, बीज में वृक्ष की तरह, अनुत्पन्न अनेक जगत् प्रलयकालमें भी स्थित रहते हैं ? स…
- Verses 24–27कौन ज्ञान से दृश्य का विनाश कर दृश्य की असिद्धि के लिए अखण्डित अपनी आत्मा को देखता हुआ दृ…
- Verse 28जैसे समुद्र से तरंग, द्रवता आदि भिन्न नहीं है, वैसे ही यह सब किससे पृथक् नहीं है ? जैसे…
- Verse 29अतीत, वर्तमान और भावी जगत्-समूह, जो कि एक बड़ा भारी भ्रम है, सदा समस्वरूप (विकाररहित) कि…
- Verse 30उदित होता है ?
- Verse 31हे राजन्, जिसकी दृढता के सामने महामेरु कमलनाल के तन्तु के समान अत्यन्त अदृढ है, अथवा जिस…
- Verses 32–34अनेक चेतनो से युक्त इस विश्व का किसने सृष्टि द्वारा विस्तार किया है ? किसकी शक्ति से शक्त…
- Verses 35–36तुमको खाने के बाद प्रचुर जठराग्नि से सम्पन्न मैं तुम्हारे जनपदों को एक क्षण भर में निगल ज…