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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verses 21–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, verses 21–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 21-23

संस्कृत श्लोक

अणौ जगन्ति तिष्ठन्ति कस्मिन्बीज इव द्रुमः । बीजानि निष्कलान्तानि स्फुटान्यनुदितान्यपि ॥ २१ ॥ कल्पः कस्य निमेषस्य बीजस्येवान्तरस्थितः । कः प्रयोजनकर्तृत्वमप्यनाश्रित्य कारकः ॥ २२ ॥ दृश्यसंपत्तये द्रष्टा स्वात्मानं दृश्यतां नयन् । दृश्यं पश्यन्स्वमात्मानं को हि पश्यत्यनेत्रवान् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

किस अणु में, बीज में वृक्ष की तरह, अनुत्पन्न अनेक जगत्‌ प्रलयकालमें भी स्थित रहते हैं ? सृष्टि के आरम्भ में जिनकी बीजपरम्परा की अवधि अव्यक्त है, ऐसे सम्पूर्ण बीज, सृष्टिकाल में जगद्रूप से विकसित किये गये भी, किसमें सदा ही अनुदित रहते हैं ? बीज के अन्दर वृक्ष की तरह निमेषरूप किसके अन्दर, कल्प स्थित है ? कौन तत्‌-तत्‌ कारकों का प्रवर्तन न करते हुए भी यानी क्रियारहित होने के कारण कारकव्यापारयितृत्वरूप कर्तृत्व का आश्रय न करके भी कर्ता है ? भोग्य की सिद्धि के लिए बाह्म॒दृष्टि से अपनी आत्मा को दृश्य बनाता हुआ कौन द्रष्टा है ? और नेत्ररहित होता हुआ भी कौन बाह्यदृष्टि से अपने आत्मरूप दृश्य को देखता है ?7