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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

राक्षस्युवाच । एकस्यानेकसंख्यस्य कस्याणोरम्बुधेरिव । अन्तर्ब्रह्माण्डलक्षाणि लीयन्ते बुद्बुदा इव ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसी ने कहा : राजन्‌, एक होते हुए भी उपाधिवश अनेक संख्यावाले, (अपरिच्छिन्न होने के कारण) समुद्र के तुल्य एवं (दुर्लक्ष्य होने के कारण) अणु के तुल्य किसके भीतर लाखों ब्रह्माण्ड समुद्र के भीतर बुद्बुदके समान लीन होते हैं ?