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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verses 32–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 32-34

संस्कृत श्लोक

केनेदमाततमनेकचिदेव विश्वं किंसार एवमतिवल्गसि हंसि पासि । किंदर्शनेन न भवस्यथवा सदैव नूनं भवस्यमलदृग्वदनः स्वशान्त्यै ॥ ३२ ॥ एषोऽसौ प्रगलतु संशयो ममोच्चैश्चित्तश्रीमुखमिहिकामलानुलेपः । यस्याग्रे न गलति संशयः समूलो नैवासौ क्वचिदपि पण्डितोक्तिमेति ॥ ३३ ॥ एवं मे यदि न विनेष्यथः क्रमोक्तं संशान्तं लघुतरसंशयं सुबुद्धी । तद्रक्षोजरठहुताशनेन्धनत्वं निर्विघ्नं झटिति गमिष्यथः क्षणेन ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

अनेक चेतनो से युक्त इस विश्व का किसने सृष्टि द्वारा विस्तार किया है ? किसकी शक्ति से शक्तिसम्पन्न होकर तुम व्यवहार करते हो, प्रजाओं का पालन करते हो ओर दण्डनीयों को दण्ड देते हो ? सबके सृष्टि आदि व्यवहार किसके बलपर होते हैं ? यह भाव हे । किसके दर्शन से तुम निर्मल दृग्रूप होकर उससे भिन्न नहीं होते हो अथवा सदा तद्रूप ही होते हो उस वस्तु को मुझसे अपनी मृत्यु को छुड़ाने के लिए तुम कहो । मेरा यह संशय, जो कि चन्द्र का कुहरे के समान, स्वात्माकारवृत्ति का आवरणभूत है, सर्वथा नष्ट हो । जिसके आगे प्रश्न करने पर मूलअज्ञानसहित संशय नष्ट नहीं होता, वह पुरुष कहीं भी ज्ञानीशब्दवाच्य नहीं होता । क्रम से कहे गये छोटे-मोटे संशयों को अगर तुम निवृत्त नहीं करोगे, तो दोनों ही राक्षसीके जठरानल के इन्धनता को, बिना किसी विघ्न बाधा के, क्षणभर में प्राप्त होओगे