Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verses 24–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, verses 24–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
अन्तर्गलितदृश्यं च क आत्मानमखण्डितम् ।
दृश्यासंपत्तये पश्यन्पुरो दृश्यं न पश्यति ॥ २४ ॥
आत्मानं दर्शनं दृश्यं को भासयति दृश्यवत् ।
कटकादीनि हेम्नेव विकीर्णं केन च त्रयम् ॥ २५ ॥
कस्मान्न किंचिच्च पृथगूर्म्यादीव महाम्भसः ।
कस्येच्छया पृथक्चास्ति वीचितेव महाम्भसः ॥ २६ ॥
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नादेकस्मादसतः सतः ।
द्वैतमप्यपृथक्कस्माद्द्रवतेव महाम्भसः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
कौन ज्ञान से दृश्य का विनाश कर दृश्य की असिद्धि के लिए
अखण्डित अपनी आत्मा को देखता हुआ दृश्य को नहीं देखता ? कौन पुरुष अपनी आत्मा को
(द्रष्टा को), वृत्ति को और दृश्य को, जैसे चक्षु दृश्य को अवभासित करता है वैसे ही, अवभासित
करता है ? जैसे सुवर्ण से कटक आदि होते हैं, वैसे ही द्रष्टा, दृश्य और दर्शन-ये तीनों किससे
उत्पन्न हुए हैं ?