Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

आत्मानं दर्शनं दृश्यं सदसच्च जगत्त्रयम् । कोऽन्तर्बीजमिवान्तस्थं स्थितः कृत्वा त्रिकालगः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे समुद्र से तरंग, द्रवता आदि भिन्न नहीं है, वैसे ही यह सब किससे पृथक्‌ नहीं है ? जैसे जलराशि से जलतरंगत्व भिन्न है, वैसे ही यह जगत्रूप द्वित किसकी इच्छासे पृथक्‌ है ? जैसे जलराशि से द्रवता भिन्न नहीं है, वैसे ही देश, काल आदि से अनवच्छिन्न अद्वितीय अतिसूक्ष्म होने के कारण असत्‌-सा प्रतीत होनेवाले वस्तुतः सद्रूप किससे द्वैत भी अपृथक्‌ यानी अभिन्न है ? ॥२६,२७। द्रष्टा, दर्शन और दृश्यरूप उद्भुतावस्था और तिरोहितावस्थावाले तीनों जगतों को कौन सर्वदा अपने भीतर रखकर स्थित है, जैसे कि बीज वृक्ष को अन्दर रखकर सदा स्थित रहता है ?