Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 71
सत्तरवाँ सर्ग समाप्त इकहत्तरवाँ सर्ग सूचिकारूप को प्राप्त होकर अपने पूर्व शरीर का स्मरण कर रही कर्कटी के पश्चात्ताप का विस्तारपूर्वक वर्णन ।
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- Verses 1–10श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इसके बाद वह कर्कटी नामकी राक्षसी चिरकालतक सब जाति के मनु…
- Verses 11–12मैं बड़ी मन्दबुद्धि हूँ, जैसे कोई मूढ़ पुरुष काँच समझकर चिन्तामणि को हाथ से छोड़ दे, वैसे…
- Verse 13कोई लोग कभी मुझे डोरे से पिरोकर धुएँ के घरों में रख देते हैं, ऐसी हालत में मुझे धुएँ के उ…
- Verses 14–15मैं नित्य दूसरे की चाकरी बजाती हूँ, दूसरे जब मुझे चलाते हैं, तब मैं चलती हूँ, अत्यन्त दीन…
- Verses 16–17वेताल की शान्ति करनेवाला कर्म करनेपर वेतालोदय हो गया, यह लोकोक्ति मेरे ऊपर ही पूरी तरह से…
- Verse 18कीड़े के शरीर से भी सूक्ष्म, अवान्तर में (मार्ग में) भाग्यवश धूली में डूबी हुई और धूलिराश…
- Verse 19यद्यपि स्थूलवर्शी पुरुष तुम्हारा उद्धार करने में समर्थ नहीं है, क्योकि तुम उनके दृष्टिगोच…
- Verse 20यदि कोई कहे कि तुमको स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए, तो इस पर कहती हैं। अज्ञानसागर में डूबी…
- Verse 21इसलिए कितने समय तक आपत्तियों से परिपूर्ण होकर मुझ मन्दभागिनी को आपत्तिरूपी गड़ढ़ों में पड…
- Verses 22–30मैं कब काजल के महाशैल की प्रतिमा के समान प्राणियों के संहार और अवष्टम्भ के द्वारा भार उता…
- Verse 31जैसे सोना अग्नि में अपने देदीप्यमान स्वरूप को भस्म बना देता हे, वैसे ही मैने ही कुतपरूपी…
- Verse 32कहाँ अंजनपर्वत के सदश दिक्-तटों को पूर्ण करनेवाला मेरा वह विशाल शरीर ओर कहाँ मकड़ी की टा…
- Verse 33जैसे अज्ञ पुरुष स्वर्ण के बाजूबन्द को पा कर भी “यह मिट्टी है” ऐसा समझकर उसका त्याग कर देत…
- Verse 34कुहरे से पूर्ण विन्ध्याचल की गुफा के सदृश हे मेरे विशाल उदर, आज तुम सिंह के सदृश अपने आवि…
- Verse 35अपने भार से पर्वत के शिरों को तोड़फोड़ देनेवाली हे मेरी भुजाओं ! चन्द्रमारूपी उज्ज्वल नखो…
- Verse 36काँचमणियों की मालाओं से शून्य होने पर भी हिमालय के तटके समान सुन्दर हे मेरे वक्षस्थल, तुम…
- Verses 37–38अंधेरी रात्रि के अन्धकाररूप शुष्क लकड़ियों को जलानेवाले हे मेरे नेत्रो, तुम आज अपनी दृष्ट…
- Verse 39प्रलयाग्नि से दग्ध चन्द्रबिम्ब के समान मनोहर हे मेरे मुखचन्द्र, तुम आज अपनी किरणों से क्य…
- Verses 40–41वे बड़े मेरे हाथ कहाँ चले गये, इसका मुझे बड़ा पश्चात्ताप है, मैं आज मक्खियों के पैरों से…
- Verse 42कहाँ वह मेरा गगनचुम्बी आकार और कहाँ यह अत्यन्त सूक्ष्म नवीन सूचीरूपी शरीर, कहाँ उसका द्यु…