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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 37,38

संस्कृत श्लोक

हा नेत्रे कृष्णरजनीरजःशुष्केन्धनैजने । कस्मान्न मे भूषयतो दृग्ज्वालामालया दिश ॥ ३७ ॥ हा स्कन्ध बन्धो नष्टोऽसि निषिद्धोऽसि महीतले । कालेन विनिपिष्टोऽसि निघृष्टोऽसि शिलातले ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

अंधेरी रात्रि के अन्धकाररूप शुष्क लकड़ियों को जलानेवाले हे मेरे नेत्रो, तुम आज अपनी दृष्टिरूपी ज्वालाओं की लपटों से दिशाओं को क्यों नहीं अलंकृत करते हो ? हे मेरे कन्धे, हे मेरे बन्धु, तुम पृथ्वी में नष्ट हो गये हो, मैंने तुम्हारा त्याग कर दिया है, कालने तुमको पर्वतो की शिलापर पीस डाला है एवं घिस डाला है