Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
त्यजत्याशु मृदित्यज्ञः प्राप्यापि कनकाङ्गदम् ।
मया सूचित्वलोभेन संत्यक्तं भासुरं वपुः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अज्ञ पुरुष स्वर्ण के बाजूबन्द को पा कर भी
“यह मिट्टी है” ऐसा समझकर उसका त्याग कर देता हे, वैसे ही इस सूचिता के लोभ से मैंने
अपने देदीप्यमान शरीर का त्याग कर दिया