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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

धूमेषु परितिष्ठामि मार्गे विलुलितास्मि च । तृणेषु प्रेषितास्म्यन्तर्हा मे दुःखपरम्परा ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई लोग कभी मुझे डोरे से पिरोकर धुएँ के घरों में रख देते हैं, ऐसी हालत में मुझे धुएँ के उपर रहना पडता है । कभी मैं मार्ग में गिर पड़ती हूँ और गिरने पर गदहे, ऊँट आदि के खुरों द्वारा रगड़ी जाती हूँ। कोई लोग नरकुल आदि तृणों के भीतर मुझे डाल देते हैं । मेरी दुःखपरम्परा का कोई ठिकाना है ?