Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 16, 17
संस्कृत श्लोक
उत्थितः स्फारवेतालः कुर्वत्याः शान्तिमद्य मे ।
सर्वनाशोऽवदातेन प्रवृत्ताया ममोदिता ॥ १६ ॥
किं मन्दया मया तादृक्संत्यक्तं तन्महावपुः ।
यथा नाशेन वा भाव्यं तथोदेत्यशुभा मतिः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
वेताल की शान्ति करनेवाला कर्म करनेपर वेतालोदय हो गया, यह लोकोक्ति मेरे ऊपर
ही पूरी तरह से घटी, ऐसा कहती है ।
गई तो थी वेताल की शान्ति के लिए, पर उससे विशाल वेताल उत्पन्न हो गया। तप करने
के लिए प्रवृत्त हुई मेरा तपस्या से सर्वनाश हो गया । मन्दमति मैंने उस प्रकार का वह विशाल
शरीर क्यों छोड़ा ? अथवा जिस प्रकार की बुद्धि होने पर सर्वथा नाश होता है, उस प्रकार की
अशुभ मति नाश के समय उत्पन्न होती ही है