Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verses 22–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, verses 22–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 22-30
संस्कृत श्लोक
कदा स्यामञ्जनमहाशैलपुत्रकरूपिणी ।
द्यावापृथिव्योर्वैधुर्ये स्तम्भतामनुतिष्ठत ॥ २२ ॥
मेघमालासमभुजा चिरं विद्युत्पदेक्षणा ।
नीहारजालवसना प्रोच्चकेशमिताम्बरा ॥ २३ ॥
लम्बोदराभ्रसंदर्शप्रनर्तितशिखण्डिनी ।
लम्बलोलस्तनी श्यामा देहवातद्रवत्स्तनी ॥ २४ ॥
हासभस्मच्छटाच्छन्नसूर्यमण्डलरोधिनी ।
कृतान्तग्रसनोद्युक्तकृत्यैकाकृतिधारिणी ॥ २५ ॥
कृशानूलूखलदृशा सूर्यस्रग्दामहारिणी ।
पर्वतात्पर्वते शृङ्गे न्यस्य पादौ विहारिणी ॥ २६ ॥
कदा मे स्याद्गुरुश्वभ्रभासुरं तन्महोदरम् ।
कदा मे स्याच्छरन्मेघमेदुरा नखरावली ॥ २७ ॥
कदा मे स्यान्महारक्षोविद्रावणकरं स्मितम् ।
स्वस्फिग्वाद्यैररण्यान्यां कदा नृत्येयमुन्मदा ॥ २८ ॥
वसासवमहाकुम्भैर्मृतमांसास्थिसंचयैः ।
कदा करिष्येऽविरतं मेदुरोदरपूरणम् ॥ २९ ॥
कदा पीतमहालोकरुधिरा क्षीबतां गता ।
भवेयं मुदिता दृप्ता मुद्रिता निद्रया ततः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं कब काजल के महाशैल की प्रतिमा के समान प्राणियों
के संहार और अवष्टम्भ के द्वारा भार उतारने के लिए आकाश और पृथ्वी की स्तम्भताको
प्राप्त करनेवाली होऊँगी। मेघमाला के समान भुजाओंवाली स्थिर बिजली के समान
नेत्रवाली, कुहरे के समूह ही जिसके वस्त्र हैं, ऊँचे ऊँचे केशों से जिसने आकाश को नाप
दिया है तथा जिसने खूब लम्बे उदररूपी मेघ के दर्शन से मयूरों को नचा दिया है इस प्रकार
की, और लम्बायमान चंचल स्तनवाली, काली, श्वासवायु से जिसके स्तन हिलते हों ऐसी,
अट्टहास के विलासरूपी दग्ध वन के धूलि के पटलों से आच्छादित सूर्यमण्डल को रोकनेवाली,
यमराज के समान सम्पूर्ण प्राणियों के ग्रसन के लिए जिसने कार्य आरम्भ किया था, इस
प्रकार की भीषण आकृति को धारण करनेवाली, अग्नि के समान देदीप्यमान, उखल के
समान गहरे नेत्रवाली, सूर्य की किरणमाला का अपहरण करनेवाली तथा एक पर्वत से दूसरे
पर्वतपर, एक शिखर से दूसरे शिखरपर पैर रखकर चलनेवाली मैं कब होऊँगी ? कब बड़े
भारी गड्ढे के समान देदीप्यमान वह बड़ा भारी मेरा उदर होगा ? शरतूकाल के मेघों के
समान स्थूल मेरी नखपंक्तियाँ कब होंगी । कब मेरा हास बड़े बड़े बलवान् राक्षसों के भी
हृदयको विदीर्ण करने में समर्थ होगा, कब मैं अपने नितम्बरूपी बाजों के वादन से महारण्य
में खूब प्रसन्न होकर नृत्य करुँगी, मज्जारूपी आसव के बड़े बड़े घड़ों से भरे हुए प्राणियों
के मांस और हड्डियों की राशियों से कब मैं लगातार अपने विशाल उदर का पोषण करूंगी,
कब मैं बड़े-बड़े जीवों के रूधिर को पीकर उन्मत्त हुई अत्यन्त आनन्द को प्राप्त होऊँगी,
तदनन्तर निद्रा की गोद में सो जाऊँगी