Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 69
अड़सठवाँ सर्ग समाप्त उनहत्तरवाँ सर्ग कर्कटी राक्षसी को मनोवांछित वर देकर तथा गुणी लोगों की रक्षा के लिए मन्त्र कहकर ब्रह्माजी का अपने लोक में जाना |
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, एक हजार वर्ष तक इस प्रकार कठिन तपस्या करने पर ब…
- Verse 2वह मन से ही ब्रह्माजी को प्रणाम कर वैसे ही स्थित रही, उसने मन में विचार किया कि मेरी भूख…
- Verses 3–5हाँ, जो वस्तु मुझे माँगनी चाहिए उसकी मुञ्चे स्फूर्ति हो गई । भगवान् ब्रह्माजी से यह एक व…
- Verse 6इस प्रकार विचार कर रही तथा शान्ति, दम, दया आदि तपस्वियों के स्वभाव के विरुद्ध हिंसा की इच…
- Verse 7हे कर्कटि, तुम राक्षसरूपी कुलपर्वत की मेघमाला हो, उठो, तुम्हारे लिए मैं सन्तुष्ट हुआ ह ।…
- Verse 8कर्कटी ने कहा : भगवन्, आप अतीत, अनागत, वर्तमान सबके नियन्ता है, यदि आप मुझे वरदान देना च…
- Verse 9श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, "जैसा तुम चाहती हो, वैसा ही हो ।* - ऐसा कहकर ब्रह्म…
- Verses 10–12अपनी अलक्ष्य माया द्वारा सब लोगों की तुम हिंसा करोगी, जिनका आहारविहार समुचित नहीं है, दुष…
- Verses 13–15से इसे दूर करो इस प्रकार आदि शक्ति की प्रार्थना कर अब उसके अधीन स्थित रोगशक्ति की प्रार्थ…
- Verse 16जिसके हृदय में रसायन है ऐसे चन्द्रमा मेँ रोगी पुरुष की स्थिति की भावना करे ओर यह भावना कर…
- Verse 17साधु पुरूष पवित्र होकर आचमन करके एकाग्र चित्त हो क्रमशः इस उपाय से सम्पूर्ण विसूचिका का व…
- Verse 18इस प्रकार आकाश में स्थित दिव्यरूपधारी ब्रह्माजी, जिनका सिद्धमन्त्र आकाशचारी सिद्धो द्वारा…