Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, Verses 13–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
गुणान्वितचिकित्सार्थं मन्त्रोऽयं तु मयोच्यते ।
ब्रह्मोवाच ।
हिमाद्रेरुत्तरे पार्श्वे कर्कटी नाम राक्षसी ॥ १३ ॥
विषूचिकाभिधाना सा नाम्नाप्यन्यायबाधिका ।
तस्या मन्त्रः ।
ॐह्रींह्रांरींरां विष्णुशक्तये नमः ।
ॐनमो भगवति विष्णुशक्तिमेनां ॐहरहर नयनय पचपच मथमथ उत्सादय दूरेकुरु स्वाहा हिमवन्तं गच्छ जीव सः सः सः चन्द्रमण्डलगतोऽसि स्वाहा ।
इति मन्त्री महामन्त्रं न्यस्य वामकरोदरे ।
मार्जयेदातुराकारं तेन हस्तेन संयुतः ॥ १४ ॥
हिमशैलाभिमुख्येन विद्रुतां तां विचिन्तयेत् ।
कर्कटीकर्कशाक्रन्दां मन्त्रमुद्गरमर्दिताम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
से इसे दूर करो इस प्रकार आदि शक्ति की प्रार्थना कर अब उसके अधीन स्थित रोगशक्ति
की प्रार्थना करते हें । तुम अपने स्थान हिमालय को जाओ । तदनन्तर रोगी से कहते हैं-जो
तुम अपने पूर्वजन्म के दुष्कृत से पीडित थे, रोग से तिरस्कृत थे, मृत्यु से खींचे जा रहे थे, अब
मन्त्र की सामर्थ्य से अमृत से पूर्ण चन्द्रमण्डल को मेरी भावना से प्राप्त हुए हो, जैसे प्रदीप्त
अग्नि में हविस् का प्रक्षेप किया जाता है, वैसे ही पूर्ण चन्द्रमण्डल में भावना द्वारा रोगी का
प्रक्षेप करना चाहिए, यह मन्त्रस्थ “स्वाहा” पदसे सूचित होता है, इस मन्त्र को मन्त्रसिद्ध पुरूष
बाँये हाथ के मध्य में बाँधकर रोगी पुरुषका उस हाथ से युक्त होकर मार्जन करे । मन्त्ररूपी
मुद्गर से पीडित, कर्कश रोदन करनेवाली ओर हिमालय की ओर भागी हुई कर्कटी की भावना
करे