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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, Verses 3–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 3-5

संस्कृत श्लोक

आ स्मृतं प्रार्थयिष्येऽहं वरमेकमिमं विभुम् । अनायसी चायसी च स्यामहं जीवसूचिका ॥ ३ ॥ अस्योक्त्या द्विविधा सूचिर्भूत्वालक्ष्या विशाम्यहम् । प्राणिनां सह सर्वेषां हृदयं सुरभिर्यथा ॥ ४ ॥ यथाभिमतमेतेन ग्रसेयं सकलं जगत् । क्रमेण क्षुद्विनाशाय क्षुद्विनाशः परं सुखम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

हाँ, जो वस्तु मुझे माँगनी चाहिए उसकी मुञ्चे स्फूर्ति हो गई । भगवान्‌ ब्रह्माजी से यह एक वर माँगूंगी कि मैं रोगरूपा और लोहमयी जीवयुक्त सूचिका होऊँ । ब्रह्माजी के इस वरदान से दो प्रकार की सजीव सूचिका होकर जैसे नासिका से आकृष्ट सुगन्धि प्राणियों के हृदय में अलक्ष्यरूपसे प्रविष्ट हो जाती है, वैसे ही सब प्राणियों के हृदय में एक साथ प्रविष्ट हो जाऊँगी । इस उपाय से अपनी अभिलाषा के अनुसार मैं सम्पूर्णं जगत्‌ को अपनी क्षुधा की निवृत्ति के लिए निगल जाऊंगी, संसार में क्षुधानिवृत्ति से बढ़कर दूसरा कोई आनन्द नहीं है