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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठउवाच । अथ वर्षसहस्रेण तां पितामह आययौ । दारुणं हि तपः सिद्ध्यै विषाग्निरपि शीतलः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, एक हजार वर्ष तक इस प्रकार कठिन तपस्या करने पर ब्रह्माजी उसके पास वर देने के लिए आये । शंका : कर्कटी अत्यन्त दुःशील थी, उसको अतिदुलभि ब्रह्माजी का प्रसाद कैसे प्राप्त हुआ ? समाधान : दारुण तपस्या सिद्धि के लिए होती ही है, तप की सिद्धि होने पर और तो और विषयुक्त अग्नि भी शीतल हो जाती है, तपस्या से कुछ भी असाध्य नहीं रहता, यह भाव है

सर्ग सन्दर्भ

अड़सठवाँ सर्ग समाप्त उनहत्तरवाँ सर्ग कर्कटी राक्षसी को मनोवांछित वर देकर तथा गुणी लोगों की रक्षा के लिए मन्त्र कहकर ब्रह्माजी का अपने लोक में जाना |