Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 5
10 verse-groups
- Verse 1पाँचवाँ सर्ग विश्व का मूल मन है, मन का मूल परमात्मा है, परमात्मा ही मन और समस्त जगत का मू…
- Verse 2सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति के मूलभूत हेतु को छोड़कर मन के मूलभूत हेतु के पूछने में कहते ह…
- Verses 3–9उक्त दो प्रश्नों में पहला प्रश्न प्रधान है, इसलिए इस सर्ग की समाप्ति तक वसिष्ठजी ने पहले…
- Verses 10–13जैसे नदी, नाले आदि का जल महासागर में ही गिरता है, वैसे ही सम्पूर्ण दृश्य पदार्थ प्रलय द्व…
- Verses 14–16जैसे क्षीण न होनेवाले जल से भरे हुए मेघ से मूसलाधार वृष्टि होती है, वैसे ही कभी क्षीण न ह…
- Verses 17–18माया ही लता है, वह चिदाकाशमें (शुद्ध चैतन्य में) उत्पन्न हुई है, चित्त उसकी जड़ है, इन्द्…
- Verses 19–21जैसे वृष्टि करनेवाले गम्भीर मेघ में मूसलाधार जलवृष्टि ओर प्रकाशमय बिजली स्फुरित होती है व…
- Verse 22नियति अर्थात् सृष्टि के अवसर में अवश्य ही सृष्टि होनी चाहिए ओर प्रलय के अवसर में अवश्य ह…
- Verse 23उससे अतिरिक्त व्योमादिशब्दवाच्य कोई दूसरी वस्तु नहीं है, ऐसा कहते हैं। शुद्ध ज्ञानमय होने…
- Verse 24अब आरोपित के मिथ्यात्व में कारण कहते हैं। चूँकि यह निविर्कार अतएव उत्पत्ति, स्थिति आदि से…