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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

प्रसरन्ति यतश्चित्राः संसारासारवृष्टयः । अक्षयामृतसंपूर्णादम्भोदादिव वृष्टयः ॥ १४ ॥ आविर्भावतिरोभावमयास्त्रिभुवनोर्मयः । स्फुरन्त्यतितते यस्मिन्मराविव मरीचयः ॥ १५ ॥ नाशरूपो विनाशात्मा योऽन्तःस्थः सर्वजन्तुषु । गुप्तो योऽप्यतिरिक्तोऽपि सर्वभावेषु संस्थितः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे क्षीण न होनेवाले जल से भरे हुए मेघ से मूसलाधार वृष्टि होती है, वैसे ही कभी क्षीण न होनेवाले आनन्द से परिपूर्ण जिस परमतत्त्व से चित्र-विचित्र संसाररूपी मूसलाधार वृष्टि होती है । जैसे मरूभूमि में कभी दिखलाई देनेवाला कभी छिप जानेवाला मरीचिकाजल स्फुरित होता है, वैसे ही जिस अतिविस्तारयुक्त (व्यापक) तत्त्व में आविभव-तिरोभावमय त्रिभुवनरूप लहरें स्फुरित होती हैँ । प्रपंचरूप से विनाशी ओर स्वरूप से अविनाशी जो सब प्राणियों के अन्दर स्थित हे । सूक्ष्म होने के कारण भीतर गुप्त ओर अतिमहन्तम होने के कारण सबसे अतिरिक्त (निष्प्रपंचरूप से अवशिष्ट) भी जो सब पदार्थो में विद्यमान हे