Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verses 3–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, verses 3–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 3-9
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महाप्रलयसंपत्तावसतां समुपागते ।
अशेषदृश्यसर्गादौ शान्तमेवावशिष्यते ॥ ३ ॥
आस्तेऽनस्तमितो भास्वानजो देवो निरामयः ।
सर्वदा सर्वकृत्सर्वः परमात्मा महेश्वरः ॥ ४ ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते यो मुक्तैरवगम्यते ।
यस्य चात्मादिकाः संज्ञाः कल्पिता न स्वभावजाः ॥ ५ ॥
यः पुमान्सांख्यदृष्टीनां ब्रह्म वेदान्तवादिनाम् ।
विज्ञानमात्रं विज्ञानविदामेकान्तनिर्मलम् ॥ ६ ॥
यः शून्यवादिनां शून्यो भासको योऽर्कतेजसाम् ।
वक्ता मन्ता ऋतं भोक्ता द्रष्टा कर्ता सदैव सः ॥ ७ ॥
सन्नप्यसद्यो जगति यो देहस्थोऽपि दूरगः ।
चित्प्रकाशो ह्ययं यस्मादालोक इव भास्वतः ॥ ८ ॥
यस्माद्विष्ण्वादयो देवाः सूर्यादिव मरीचयः ।
यस्माज्जगन्त्यनन्तानि बुद्बुदा जलधेरिव ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त दो प्रश्नों में पहला प्रश्न प्रधान है, इसलिए इस सर्ग की समाप्ति तक वसिष्ठजी ने
पहले प्रश्न का उत्तर दिया ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, महाप्रलयावस्था में, जगत् के अतिसूक्ष्मरूप से स्थित होने
के कारण, अपने कार्य में असमर्थ होने पर सम्पूर्ण दृश्यवर्ग की सृष्टि से पहले जगत्
निर्विक्षेपावस्था में शेष रहता है उस समय स्वयंज्योति, अजन्मा, प्रकाशमान, आनन्दघन
सदा सर्वशक्तिमान् देवाधिदेव अविनाशी केवल परमात्मा ही रहते हैँ । जिससे वाणिर्यो भी
निवृत्त हो जाती हैं, जिसे जीवन्मुक्त महात्मा जानते हैं और जिसकी आत्मा आदि संज्ञाएँ
स्वाभाविक नहीं है किन्तु कल्पित हैं अर्थात् उसकी आत्मा आदि संज्ञाएँ अनारोपित स्वरूप से
उत्पन्न नहीं हे, किन्तु आरोपित धर्म से उत्पन्न हुई हँ । जिसे सांख्यदर्शन माननेवाले “पुरुष”
कहते हैं, वेदान्ती "ब्रह्म" कहते हैं, विज्ञानवादी अत्यन्त निर्मल केवल “क्षणिकविज्ञानरूप
कहते हैं और जिसे शून्यवादी शून्य” कहते हैँ । भाव यह कि सभी वादियों के अपने-अपने
बुद्धिवेभव से कल्पित विविध सिद्धान्तो का विषय वही है, सबके अधिष्ठानभूत उस परमात्मा
के विषय में किसीको भी विवाद नहीं है । जो सूर्य के प्रकाशका भी प्रकाशक है, सदा सत्य
बोलनेवाला, सत्य मनन करनेवाला, भोक्ता, द्रष्टा और कर्ता है । जगत् में सर्वदा विद्यमान
होता हुआ भी असत् कर देनेवाली अविद्या से आवृत्त होने के कारण पामर पुरूषों की दृष्टि में
जो असत् है, जो देहमें स्थित होने पर भी अविद्यावृत्त होने के कारण पामरो की दृष्टि में दूर
स्थित है, सूर्य से उजियाले की भाँति जिससे वह चैतन्यरूपी प्रकाश होता है, सूर्य से किरणों
के सदुश जिससे विष्णु आदि देवता उत्पन्न होते हैं एवं सागर से अनन्त बुद्बुदं की नाई
जिससे कोटि कोटि ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं