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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

प्रकृतिव्रततिर्व्योम्नि जाता ब्रह्माण्डसत्फला । चित्तमूलेन्द्रियदला येन नृत्यति वायुना ॥ १७ ॥ यश्चिन्मणिः प्रकचति प्रतिदेहसमुद्गके । यस्मिन्निन्दौ स्फुरन्त्येता जगज्जालमरीचयः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

माया ही लता है, वह चिदाकाशमें (शुद्ध चैतन्य में) उत्पन्न हुई है, चित्त उसकी जड़ है, इन्द्रियाँ उसके पत्ते हैं और कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड उसके सुन्दर फल हैं । वह मायारूपी लता वायुरूप जिससे परिचालित होती है । जो चैतन्यरूपी मणि प्रत्येक देहरूपी पेटी में प्रकाशित होती है और चन्द्रमा में किरणों की नाई जिसमें ये अनेक जगत्‌ स्फुरित हैं