Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्मुनिशार्दूल किमिवेह मनोभ्रमे ।
विद्यते कथमुत्पन्नं मनो मायामयं कुतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पाँचवाँ सर्ग
विश्व का मूल मन है, मन का मूल परमात्मा है,
परमात्मा ही मन और समस्त जगत का मूल तत्त्व है, इस विषय का वर्णन ।
पूर्वोक््त प्रकार से मन के मिथ्यात्व वर्णन करने से प्रकरणार्थ के स्पष्ट होने पर मन के
अधिष्ठान के तत्त्व की, उसके आरोप के प्रकार की और उसके मिथ्यात्व में हेतु की जिज्ञासा
कर रहे श्रीरामचन्द्रजी बोले ।
हे मुनिश्रेष्ठ, इस मन के भ्रम में परमार्थभूत मूल क्या है, भगवन्, मायामय यह मन कहाँ से
कैसे उत्पन्न हुआ ?